...वह बस घर पहुचां ही है . दिन में शहर के उपनगर तक काम के सिलसिले में जाना हुआ था , दिनभर कोई १४०-१५० कि.मी. मोटरसाइकिल चलाकर हाथ -पैर दर्द कर रहे हैं. " काश घर पहुचते ही एक कप चाय मिल जाये "
... पत्नी तो ताला लगाकर कही गयी है. मुंह चिढ़ाता ताला कह रहा है " महाशय ! चाय तो आप भी बना लोगे पर पर पत्नी के हाथ से बनी चाय का स्वाद और सुख उसमे नहीं मिलेगा, वह प्रेम 'तत्व' नहीं डाल पाओगे जो पत्नियों को ही सुलभ है, सच तो यह है कि 'यह सुख' पैसे और परिश्रम से नहीं प्रारब्ध (किस्मत) से मिलता है "
पदचाप कि आह्ट हुई है ..पत्नी आ गई ...कुछ कुछ जल्दबाजी में ...कुछ कुछ झेंपती सी घबराई सी ... अनजाना अपराध-बोध टपकाती सी... ..-" सोचा था शाम की सब्जी ले लूँ , पाता ही नहीं लगा और देर हो गई , थक गए हैं न ?? अभी "चाय" बनती हूँ " वह मुस्कुरा रहा है शायद प्रारब्ध पर...
पदचाप कि आह्ट हुई है ..पत्नी आ गई ...कुछ कुछ जल्दबाजी में ...कुछ कुछ झेंपती सी घबराई सी ... अनजाना अपराध-बोध टपकाती सी... ..-" सोचा था शाम की सब्जी ले लूँ , पाता ही नहीं लगा और देर हो गई , थक गए हैं न ?? अभी "चाय" बनती हूँ " वह मुस्कुरा रहा है शायद प्रारब्ध पर...