रविवार, 18 मार्च 2012

प्रारब्ध..

...वह बस घर पहुचां ही है . दिन में शहर के उपनगर  तक काम के सिलसिले में जाना हुआ था , दिनभर कोई १४०-१५० कि.मी. मोटरसाइकिल चलाकर हाथ -पैर दर्द कर रहे हैं. " काश घर पहुचते ही एक कप चाय मिल जाये "
... पत्नी तो ताला लगाकर कही गयी है. मुंह चिढ़ाता ताला कह रहा है  " महाशय ! चाय तो आप भी बना लोगे पर पर पत्नी के हाथ से बनी चाय का स्वाद और सुख उसमे नहीं मिलेगा, वह प्रेम 'तत्व' नहीं डाल पाओगे जो पत्नियों को ही सुलभ है, सच तो यह है कि 'यह सुख' पैसे और परिश्रम से नहीं प्रारब्ध (किस्मत) से मिलता है "
पदचाप कि आह्ट हुई है ..पत्नी आ गई ...कुछ कुछ जल्दबाजी में ...कुछ कुछ झेंपती सी घबराई सी ... अनजाना अपराध-बोध टपकाती सी... ..-" सोचा था शाम की सब्जी ले लूँ , पाता ही नहीं लगा और देर हो गई , थक गए हैं न ?? अभी "चाय" बनती हूँ " वह मुस्कुरा रहा है शायद प्रारब्ध पर...

सूखी होली - ज़रूरत या झूठा अपराधबोध

होली पर मुझे अधिकतर वो ही लोग बिना पानी के होली खेलने की सलाह देंगे.

- जो शेविंग करने में एक बाल्टी पानी 'वेस्ट कर' देते है...
- रोज फव्वारे के नीचे , 'बाथ टब' में स्नान करते वक़्त 20 बाल्टी पानी 'बर्बाद' कर देते है...
- महीने में एक बार स्विमिंग पुल में जरुर स्नान करने जायेंगे ...
- रोज अपनी कार धोते वक्त १० बाल्टी पानी 'ढोल' देंगे...
- मंजन करते वक़्त (क्षमा करें, अंग्रेजीदां इसे ब्रश करते समय पढ़ें ) दो बाल्टी पानी पर "पानी फेर देंगे" ...

मै तो होली पानी वाली ही खेलूँगा... वैसे भी मेरी होली का "सारा गणित " ८ बाल्टी पानी प्रति व्यक्ति में हो जाता है और मेरे परिवार का हर 'व्यक्ति' कम से कम ३६५ बाल्टी प्रति वर्ष (प्रति दिन के गणित से ) बचाता है ...
मेरा तो अधिकार बनता है वर्ष भर इतनी चिंता करने के बाद अपना पर्व "अपने ढंग" से और जरा " ढंग - धांग" मनाने का
सोचना उन्हें है जो वर्ष भर नहीं सोचते...
-संदीप भालेराव

" ख़ामोशी की ज़ुबां "

जो समझा था हर बात मेरे बिना कहे , कहता है वह आज कुछ कहने को ....क्या कहूँ मै
जिस पर है नाज़ , बिना शुबहे , उकसाता है वह आज अनचाहा कुछ करने को ....क्या कहूँ मै
नादानियाँ भी जिसकी ना-गवार न गुजरी कभी , हरकते हैं उसकी आज काफी यकीं तोड़ देने को ....क्या कहूँ मै
यूँ तो ज़िन्दगी भर का सिलसिला भी कम है, वह दर्द बयां करने को
गर दिल की हकीकत समझती है नज़र उसकी तो 'सिद्धांत', ख़ामोशी की ज़ुबां ही काफी है बता देने को ....क्या कहूँ मै

-संदीप भालेराव "सिद्धांत"