मंगलवार, 15 मई 2012

मनुष्य

सुबह जब पूजा करता हूँ ..शाम को अपनी बेटी और भतीजी को कहानी के रूप में संस्कार देता हूँ .....तब
..तब मै ब्राह्मण होता हूँ .
रविवार को छत पर टंकी और घर में शौचालय साफ करता हूँ ...हर दिन अपने व्यवसाय को जीवित रखने के लिए 'हाड़-तोड़' श्रम करता हूँ ...तब
...तब मै शुद्र होता हूँ .
खरीदी में कम लगे और बिक्री में ज्यादा मिले इस सोच के साथ जब अपनी सारी कुशलता से वार्तालाप करता हूँ ..बिना धैर्य खोये ...
...काम का वह ढंग खोजता हूँ कि सिर्फ मेरा ही नहीं ..मेरे कामगारों का भी परिवार पले ......तब
...तब मै वैश्य होता हूँ .
मेरे बाबा को छु ले कोई ...दादा पर तिरछी नज़र भर डाले ....परिवार/समाज/राष्ट्र के अहित कि कामना करे कोई .....तो दहकता -धधकता मै मारने-मरने पर उतारू हो जाता हूँ ....तब
...तब मै ही क्षत्रिय होता हूँ
एक ही दिन में सुबह से रात तक बार-बार ...लगातार मै अपना 'वर्ण' बदलता हूँ (रंग नहीं )
कौन हूँ मै ???
-मै हूँ 'मनुष्य'
वैसे तो यह हम सबमें है पर हम जानना नहीं चाहते...
या फिर मानना...या मानते है तो फिर बताना नहीं चाहते
..जाने इस मनुष्य के कितने रंग हैं ??? (वर्ण नहीं )


-संदीप भालेराव

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